देहरादून। आगामी 6 अप्रैल 2025 को श्री राम नवमी का उत्सव अपार श्रद्धा, भक्ति और दिव्यता के साथ अत्यंत धूमधाम से मनाया जाएगा। यह पावन दिन राम भक्तों के लिए भावविभोर कर देने वाला होगा, जब अयोध्या नगरी पुनः श्रीराम के जन्म की अनुपम लीला की साक्षी बनेगी। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चंपत राय ने इस विषय पर होने वाले कार्यक्रम की जानकारी साझा की। रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है जो अप्रैल में आता है। इस साल भगवान राम का जन्मोत्सव बहुत खास होने वाला है। इस साल रामनवमी 6 अप्रैल 2025 में मनाई जाएगी और इस दिन सुकर्मा योग, रवि योग, रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि और पुष्य नक्षत्र का संयोग है। राम नवमी के दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 8 मिनट से शुरु होगा। यह मुहूर्त दोपहर के 1 बजकर 39 मिनट तक बना रहेगा। आप इस अवधि में प्रभु श्रीराम की उपासना कर सकते हैं।
डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की हिंदू धर्म में भगवान राम को आदर्श पुरुष और महान योद्धा के रूप में पूजा जाता है। उनकी उपासना से साधक को सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं व्यक्ति की अध्यात्मिक उन्नति भी होती हैं। इस दौरान राम जी को प्रसन्न और उनकी विशेष कृपा पाने के लिए राम नवमी की तिथि को सबसे शुभ माना गया है। बता दें, रामनवमी भगवान राम के जन्म के अवसर में मनाई जाती है। इस दिन उनकी पूजा-अर्चना और दान-पुण्य से जुड़े कार्य करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पंचांग के मुताबिक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को रामनवमी मनाई जाती है। इस बार 6 अप्रैल 2025 को राम नवमी है।पंचांग के अनुसार इस बार चैत्र शुक्ल नवमी तिथि की शुरुआत 5 अप्रैल को शाम 7 बजकर 26 मिनट पर होगी। इसका समापन 6 अप्रैल को शाम 7 बजकर 22 मिनट पर है। उदया तिथि के मुताबिक 6 अप्रैल 2025 को राम नवमी का महापर्व पूरे भारत में मनाया जाएगा।पंचांग के अनुसार राम नवमी पर पुष्य नक्षत्र बन रहा है। इसके अलावा इस दिन सुकर्मा योग बना रहेगा, जो शाम 6 बकर 54 मिनट तक है। इसके बाद धृति योग का निर्माण होगा।
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस बालकाण्ड में स्वयं लिखा है कि उन्होंने रामचरित मानस की रचना का आरम्भ अयोध्यापुरी में विक्रम सम्वत् १६३१ (१५७४ ईस्वी) के रामनवमी (मंगलवार) को किया था। हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुनः स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया था।
श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था। श्रीरामनवमी का त्यौहार पिछले कई हजार सालों से मनाया जा रहा है। रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियाँ थीं लेकिन बहुत समय तक कोई भी राजा दशरथ को सन्तान का सुख नहीं दे पायी थीं जिससे राजा दशरथ बहुत परेशान रहते थे। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा दशरथ को ऋषि वशिष्ठ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने को विचार दिया। इसके पश्चात् राजा दशरथ ने अपने जमाई, महर्षि ऋष्यश्रृंग से यज्ञ कराया। तत्पश्चात यज्ञकुण्ड से अग्निदेव अपने हाथों में खीर की कटोरी लेकर बाहर निकले। यज्ञ समाप्ति के बाद महर्षि ऋष्यश्रृंग ने दशरथ की तीनों पत्नियों को एक-एक कटोरी खीर खाने को दी। खीर खाने के कुछ महीनों बाद ही तीनों रानियाँ गर्भवती हो गयीं। ठीक 9 महीनों बाद राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या ने श्रीराम को जो भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे, कैकयी ने श्रीभरत को और सुमित्रा ने जुड़वा बच्चों श्रीलक्ष्मण और श्रीशत्रुघ्न को जन्म दिया। भगवान श्रीराम का जन्म धरती पर दुष्ट प्राणियों को संघार करने के लिए हुआ था। रामनवमी के त्यौहार का महत्व हिंदु धर्म सभ्यता में महत्वपूर्ण रहा है।
इस पर्व के साथ ही माँ दुर्गा के नवरात्रों का समापन भी होता है। हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन पूजा अर्चना की जाती है। रामनवमी की पूजा में पहले देवताओं पर जल, रोली और लेपन चढ़ाया जाता है, इसके बाद मूर्तियों पर मुट्ठी भरके चावल चढ़ाये जाते हैं। पूजा के बाद आरती की जाती है। कुछ लोग इस दिन व्रत भी रखते है। यह पर्व भारत में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के दिन ही चैत्र नवरात्र की समाप्ति भी हो जाती है। हिंदु धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था अत: इस शुभ तिथि को भक्त लोग रामनवमी के रूप में मनाते हैं एवं पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य के भागीदार होते है।