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फैसला सुरक्षित, फिर भी ‘क्लीन चिट’ का दावा; गणेश जोशी के बयान पर उठे सवाल

ED नहीं, आय से अधिक संपत्ति मामले में हाई कोर्ट की सुनवाई पर विवाद; याचिकाकर्ता विकेश नेगी ने न्यायपालिका की गरिमा का मुद्दा उठाया

देहरादून। उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले में हाई कोर्ट का फैसला आने से पहले ही उनके द्वारा याचिका खारिज होने और खुद को ‘क्लीन चिट’ मिलने का दावा किए जाने से प्रदेश की सियासत गरमा गई है। हालांकि, उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के अनुसार मामले में अंतिम फैसला अभी सुनाया जाना बाकी है और जजमेंट रिजर्व है।

मंत्री के बयान के बाद याचिकाकर्ता विकेश सिंह नेगी ने सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि फैसला सार्वजनिक होने से पहले ही उसके परिणाम की जानकारी होने का दावा न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और उसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

8 सितंबर को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित

मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकल पीठ के समक्ष चल रहा है। मामले में अंतिम बहस 8 सितंबर 2026 को पूरी हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नलिन सौन, राज्य सरकार की ओर से संक्षिप्त धारक मनोज भट्ट और प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता मनीषा भंडारी अदालत में मौजूद रहीं।

सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायिक प्रक्रिया में इसका अर्थ है कि अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुन ली हैं, लेकिन अंतिम निर्णय अभी सुनाया जाना बाकी है।

फैसले से पहले मंत्री के दावे से विवाद

फैसला सुरक्षित रखे जाने के कुछ दिन बाद 11 सितंबर को मंत्री गणेश जोशी ने मीडिया के सामने दावा किया कि हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ दाखिल याचिका खारिज कर दी है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत ने याचिकाकर्ता पर सख्त टिप्पणियां की हैं और उन्हें फटकार लगाई है।

जोशी ने अपने बयान में कहा कि उन्हें आदेश की जानकारी मिली है और इसी आधार पर उन्होंने मीडिया को इसकी जानकारी दी। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन और जनता के विश्वास का भी उल्लेख करते हुए इसे अपने लिए राहत के रूप में पेश किया।

हालांकि, अदालत के उपलब्ध रिकॉर्ड में उस समय तक फैसला सुनाए जाने की पुष्टि नहीं हुई थी।

याचिकाकर्ता ने उठाया ‘फैसला पहले कैसे पता चला’ का सवाल

मंत्री के दावे के बाद याचिकाकर्ता विकेश सिंह नेगी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि जब 8 सितंबर को अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था और उसे अभी खुली अदालत में सुनाया नहीं गया, तो मंत्री को कथित तौर पर फैसले की जानकारी कैसे मिली।

नेगी ने इस पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि यदि फैसला अभी सुनाया ही नहीं गया था, तो उसके नतीजे का दावा किस आधार पर किया गया।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के बयान से आम लोगों के बीच न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।

रिकॉर्ड सामने आने के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद

मामले में अदालत का लिखित अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में मंत्री की ओर से याचिका खारिज होने का दावा राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। विपक्षी नेताओं और याचिकाकर्ता की ओर से इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

पूरे विवाद का केंद्र अब यही है कि जब अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था, तब अंतिम निर्णय से पहले उसके परिणाम की जानकारी सार्वजनिक रूप से कैसे सामने आई।

फिलहाल, हाई कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है। अदालत का निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि याचिका पर न्यायालय ने क्या निष्कर्ष दिया है।

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