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उत्तरकाशी में सौर परियोजनाओं के आवंटन पर उठे सवाल, 81 में से 67 प्लांट स्थापित

मोरी, पुरोला और नौगांव में 13.25 मेगावाट क्षमता के प्लांट चालू; 2025 की शिकायतों की जांच का निष्कर्ष अब तक सार्वजनिक नहीं, UERC ने भी मांगे परियोजनाओं के दस्तावेज

उत्तरकाशी। मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत उत्तरकाशी जिले के मोरी, पुरोला और नौगांव विकासखंडों में स्वीकृत सौर परियोजनाओं के आवंटन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। तीनों विकासखंडों में कुल 81 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जिनमें से 67 सोलर प्लांट स्थापित हो चुके हैं। शेष 14 परियोजनाएं अभी स्थापित नहीं हुई हैं। स्थापित प्लांटों की कुल क्षमता 13.25 मेगावाट बताई गई है।

मामले को लेकर चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि वर्ष 2025 में योजना के आवंटन में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों और उनके परिजनों को लाभ पहुंचाने तथा ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के नियम के पालन में गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं। इन शिकायतों के बाद प्रमुख सचिव ऊर्जा स्तर से जिलाधिकारियों को पूर्व में हुए आवंटनों की जांच के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। नियमों के विरुद्ध आवंटन पाए जाने पर सब्सिडी रोकने की बात भी कही गई थी। हालांकि, जांच का अंतिम निष्कर्ष और उसके आधार पर हुई कार्रवाई का ब्योरा अब तक सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।

मोरी में 29, पुरोला में पांच और नौगांव में 33 प्लांट स्थापित

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नौगांव विकासखंड में सबसे अधिक 46 परियोजनाएं स्वीकृत की गई थीं। इनमें से 33 प्लांट स्थापित हो चुके हैं। मोरी में 30 में से 29 और पुरोला में सभी पांच परियोजनाएं स्थापित हैं।

विकासखंड स्वीकृत परियोजनाएं स्थापित प्लांट स्थापित क्षमता
मोरी 30 29 5,800 किलोवाट
पुरोला 5 5 850 किलोवाट
नौगांव 46 33 6,600 किलोवाट
कुल 81 67 13,250 किलोवाट

मोरी के कुकरेड़ा क्षेत्र में भी सौर परियोजनाओं का उल्लेख क्षेत्रीय रिपोर्टों में हुआ है। हालांकि, किसी क्षेत्र में परियोजनाओं की संख्या अधिक होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। इसके लिए प्रत्येक परियोजना से जुड़े दस्तावेजों और आवंटन प्रक्रिया की जांच जरूरी है।

‘पहले आओ, पहले पाओ’ के नियम की जांच जरूरी

मार्च 2023 में संशोधित योजना के प्रावधानों के अनुसार, निर्धारित क्षमता से अधिक आवेदन मिलने पर पूर्ण दस्तावेजों के साथ पोर्टल पर आवेदन प्राप्त होने की तारीख के आधार पर ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के सिद्धांत से परियोजनाओं का आवंटन किया जाना था। इसके साथ ही परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता सुनिश्चित करना भी अनिवार्य था।

ऐसे में आवंटन प्रक्रिया की निष्पक्षता परखने के लिए आवेदन की तारीख, दस्तावेज पूरे होने की तारीख, तकनीकी व्यवहार्यता रिपोर्ट और लेटर ऑफ अवार्ड जारी होने की तारीख का मिलान करना आवश्यक है। केवल लाभार्थियों के नाम सामने आने से प्रक्रिया की पारदर्शिता साबित नहीं हो सकती।

संशोधित नियमों में एक परिवार से एक आवेदक को परियोजना देने का प्रावधान भी शामिल है। इसलिए यह जांचना जरूरी है कि कहीं एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर एक से अधिक परियोजनाओं के आवेदन या आवंटन तो नहीं हुए। हालांकि, केवल समान उपनाम या पारिवारिक संबंध के आधार पर किसी को नियमों का उल्लंघन करने वाला नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों और वास्तविक पारिवारिक स्थिति का परीक्षण जरूरी है।

2025 की शिकायतों पर जांच रिपोर्ट का इंतजार

इस मामले में सबसे अहम सवाल वर्ष 2025 में मिली शिकायतों और उनके बाद हुई जांच को लेकर है। यदि आवंटन प्रक्रिया की जांच के निर्देश दिए गए थे, तो अब तक उसका अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? जांच में कितने लाभार्थियों के मामले शामिल किए गए और कितने आवंटन नियमों के अनुरूप पाए गए, इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है।

इसके अलावा, यदि किसी मामले में अनियमितता मिली तो संबंधित परियोजना की सब्सिडी रोकने या अन्य कार्रवाई के संबंध में क्या निर्णय लिया गया, यह भी स्पष्ट होना बाकी है। इन सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट और विभागीय अभिलेखों से ही मिल सकता है।

UERC ने भी मांगे आवंटन से कमीशनिंग तक के दस्तावेज

उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) की वर्ष 2026 की कार्यवाही में भी मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत 200 किलोवाट क्षमता वाली परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेज मांगे गए हैं। आयोग ने उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (UREDA) से परियोजनाओं के आवंटन से लेकर कमीशनिंग तक की पूरी कालानुक्रमिक जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। इसमें परियोजना मॉनिटरिंग रिपोर्ट और संबंधित अभिलेख भी शामिल हैं।

आयोग के रिकॉर्ड में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें आवेदकों ने वर्ष 2024 में आवेदन करने के बावजूद वर्ष 2026 में लेटर ऑफ अवार्ड जारी किए जाने का मुद्दा उठाया। इससे आवेदन, तकनीकी परीक्षण और आवंटन के बीच लगने वाले समय को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, आयोग की ओर से दस्तावेज मांगा जाना अपने आप में किसी परियोजना में अनियमितता का प्रमाण नहीं है।

सरकारी कर्मचारियों के परिजनों को लाभ मिलने पर भी सवाल

योजना के किसी लाभार्थी का सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का रिश्तेदार होना अपने आप में नियमों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। जांच का मुख्य बिंदु यह होना चाहिए कि संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की आवेदन, तकनीकी परीक्षण, आवंटन, विद्युत कनेक्शन, निरीक्षण, सब्सिडी अथवा भुगतान की प्रक्रिया में कोई भूमिका थी या नहीं।

यदि पारिवारिक संबंध के साथ निर्णय प्रक्रिया में प्रभाव डालने, नियमों से हटकर आवंटन करने या हितों के टकराव के तथ्य सामने आते हैं, तभी मामले की गंभीरता तय हो सकेगी। इसलिए जांच केवल लाभार्थियों के नाम तक सीमित न रहकर पूरी निर्णय प्रक्रिया पर केंद्रित होनी चाहिए।

नामवार सूची और परियोजनाओं की फाइल सार्वजनिक करने की मांग

उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से वर्ष 2026 तक की सभी 81 परियोजनाओं की पूरी और अद्यतन स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। ऐसे में मोरी, पुरोला और नौगांव की स्वीकृत परियोजनाओं की नामवार सूची सार्वजनिक करने की जरूरत है।

इसके साथ प्रत्येक परियोजना की आवेदन तिथि, भूमि का विवरण, तकनीकी व्यवहार्यता रिपोर्ट, जिला स्तरीय समिति की कार्यवाही, लेटर ऑफ अवार्ड, पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA), कमीशनिंग प्रमाणपत्र और सब्सिडी व भुगतान का ब्योरा भी सामने आना चाहिए। इससे यह पता चल सकेगा कि किस आवेदक को कब और किन आधारों पर परियोजना आवंटित की गई।

दस्तावेजी ऑडिट से ही स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति

फिलहाल उपलब्ध आंकड़े और दस्तावेज यह साबित नहीं करते कि मोरी, पुरोला या नौगांव में किसी अधिकारी-कर्मचारी अथवा उसके परिजन को नियम विरुद्ध तरीके से योजना का लाभ दिया गया है। लेकिन वर्ष 2025 की शिकायतों, आवंटन के निर्धारित नियमों और UERC की ओर से दस्तावेज मांगे जाने के बाद परियोजनाओं की पूरी प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।

अब जरूरत है कि संबंधित विभाग 81 परियोजनाओं का पारदर्शी दस्तावेजी ऑडिट कराए और वर्ष 2025 में हुई जांच का निष्कर्ष सार्वजनिक करे। इससे योजना के आवंटन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि सरकारी सहायता वास्तविक पात्र लाभार्थियों तक निर्धारित नियमों के अनुसार पहुंची या नहीं।

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